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पूर्वकथन

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों !
जब से मेरी शादी हुई है तब से मैं बहुत व्यस्त रहने लगी हूँ, पहले तो घर गृहस्थी का काम और फिर मेंटर प्लस मतलब मेरी ट्यूशन क्लासेज, दिन के पाँच घंटे उसमें भी देती हूँ, इस प्रकार आर्थिक स्वतंत्रता और स्वत्व दोनों ही निभ जाते हैं और मेरा मन भी लगा रहता है, बच्चों और उनकी गतिविधियों के निरीक्षण से मेरा स्वयं का जीवन और उसकी गूढ़ता जैसे उमड़ उमड़ कर सामने आने लगी है तिस पर तरह तरह की पुस्तकों का पूर्व अध्ययन भी बहुत काम आ रहा है !
इन सबके बीच मैं अपनी दो बहनों और भाई को अक्सर याद करती हूँ, कुछ जिम्मेदारी है मुझ पर उसका बोध होता रहता है, यूँ तो फ़ोन पर बातचीत अक्सर ही हो जाती है, वीडियो कॉल ने तो और भी सुविधा कर दी है, हालाँकि कॉल क़्वालिटी बहुत अच्छी नहीं रहती पर फिर भी मन को बहुत तसल्ली होती है , ऐसा नहीं लगता कि हम कुछ मिस कर रहे हैं, पर मिस तो कर ही रहे हैं, ज्यादातर बातचीत हम सभी के जीवन में घटने वाली दैनिक घटनाओं पर ही आधारित होती है, जिसमें हम चाहते हुए भी एक दूसरे की कोई मदद नहीं कर पाते हैं और न ही कभी इतना समय मिलता है कि होने वाली इन घटनाओं की बैठ के समीक्षा कर पाएं कि ऐसा क्यों हुआ !
इतने दिन दूर दूर रहते हुए हम सब भी कुछ बदल से गए हैं, अपनी नयी दुनिया के हिसाब से ढल गए हैं ! अपने ओहदों का, lifestyle  की कुछ आदत सी भी हो गयी है, कुछ comfort zones  भी बन गए हैं, जिनसे निकलने का मन नहीं करता अब, कुछ नयी मान्यताएं (notions) भी बन गयी है!
लेकिन भाई बहनों का रिश्ता कुछ ऐसा होता है  जिसकी बात ही कुछ और है, उसके पीछे कारण भी है कि हम  वो लोग हैं , जिनका एक ही बचपन था, जब जीवन गढ़ रहा था, हमारा व्यक्तित्व अपनी नींव रख रहा था तब हम एक साथ थे, यहाँ तक कि वो गढ़ना एक जैसा है, चीजों के देखने का नजरिया हमने एक दूसरे से बदला था, कई झगड़े किये थे, जिनमें से एक भी दिल में न रखा था! कोई थोड़ा पढ़ने में अच्छा था कोई थोड़ा कमजोर, हमारे सबके अपने शौक थे, और हम सब एक दूसरे के शौकों में शरीक !
हम्म ! यादें बहुत है, और शब्दों में वो ताकत कहाँ कि मन में क्या महसूस होता है उसे बता सकें !
तो मैंने सोचा है कि मैं कुछ लिखूं, वो सब जो मैं तुमसे कहना चाहती हूँ, बताना चाहती हूँ, सिखाना चाहती हूँ, चाहती हूँ कि जो गलतियाँ मुझसे हो गयीं, तुम न करो, कुछ अनुभव और निष्कर्ष जिन्हें बताने का मौका नहीं मिला, उसका दस्तूर बनाना चाहती हूँ !
मुझे पता है कि तुम सब समय निकाल कर इन्हें जरूर पढ़ोगे और हम फिर से कुछ गहन चर्चा कर पाएंगे, जीवन को दिशा दे पाएंगे , निश्चित स्वीकृत दिशा को निभा पाएंगे और मंज़िल पर पहुँच पायेंगे !

जल्दी ही कुछ और लिखूँगी !

तुम्हारी दीदी !

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