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बड़े भाई साहब - याद हैं न !

माता-पिता, मातृभाषा, शहर, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, स्कूल, मान्यताएं, संस्कार, आस पड़ोस के लोग, खानपान, रहन सहन और वातावरण इन सभी का जोड़  हैं 'हम'!
हमने बारहवीं तक एक ही बोर्ड से पढ़ाई करी है, हिंदी मीडियम, इलाहबाद या उत्तर प्रदेश बोर्ड ! प्रत्येक राज्य के बोर्ड की अपनी मातृभाषा की कुछ पुस्तकें होती हैं, वहाँ के अध्यापकों, स्कूलों की कुछ रवायतें होती हैं जिनकी अमिट छाप जीवन भर के लिए विद्यार्थी के स्मृतिपटल पर अंकित हो जाती है, स्कूल के बाहर लगने वाली दुकानों पर मिलने वाली भेल, लइया चना, चूरन, इमली, कैथे, कमरख के स्वाद होते हैं, जो फिर कभी चखने नहीं मिलते ! कुछ कवितायेँ , किसी टीचर के किस्से, किसी खास लेखक की कोई कहानी, जिसका रसास्वादन आजीवन होता रहता है ! है न !
मेरी सबसे पसंदीदा कहानियों में प्रेमचंद जी की 'बड़े भाई साहब' है ! कुछ डूबता कुछ उछलता सा है मन में, जब भी मैं उस कहानी को याद करती हूँ, हालाँकि वह कहानी अपने पाठ्यक्रम में नहीं थी, फिर भी शायद तुम लोगों को याद हो एक बार मैं अपनी एक सहेली वर्तिका के पास से प्रेमचंद का कहानी संकलन ले आयी थी जिसे हम सब ने बारी बारी बड़े चाव से पढ़ा था और बस अपने हाव भाव से ही तुम लोगों ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट करी थी, जो रस उस बेतुके वाक्य 'श्रीयुत अमीना भाई भाई ' का है उसका आस्वादन तो बस उस कहानी को पढ़ने वाला ही जान सकता है !
साहित्य में चमत्कार को महसूस करने वालों की स्थिति वैसी ही है जैसे गूंगे ने गुड़ खा लिया हो और अब बताये भी तो कैसे ! तो अगर फिर से वो गुड़ खाने का मन करे तो इस लिंक को खोलकर पढ़ लेना  - बड़े भाई साहब - प्रेमचंद 
बातें ज़ारी रहेंगी  !
सबको ढेर सारा प्यार
- दीदी 

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