जब हम सब छोटे थे, दुनिया कुछ देखी न थी, थोड़े बड़े ही हुए थे, आस पास कुछ दोस्त बना लिए थे, क्लास में भी अपना रंग जमा लिया था, होमवर्क पूरा हो जाये, अमीबा, पैरामीशियम, मेंढक आदि के चित्र बन जाएँ, इतिहास और नागरिक शास्त्र भी याद हो जाए तो ऐसा लगता था मानो जीवन सफल हो जाएगा, कई बार हुआ भी लेकिन कई बार नहीं भी हुआ ! ऐसा लगता था न जाने कब इस पढ़ाई का अंत होगा, न जाने कब स्कूल छूटेगा और ऐसे करते करते एक दिन हाई स्कूल का रिजल्ट आया फिर और दो साल कहीं फुर्र हो गए , स्कूल में फेयरवेल भी हो गया, और इण्टर का रिजल्ट आ गया, पता है कितना गर्व महसूस करते हैं अपने मम्मी पापा कि हम सब फर्स्ट डिवीज़न में पास हुए ! कितने लड्डू काली मठिया मंदिर में चढ़े हैं जब जब कुछ अच्छा घटा है हमारे जीवन में !
हम सब उनके जीवन की एक मात्र पूँजी है, उन्होंने अपने शरीर और आत्मा दोनों को हम लोगों में इन्वेस्ट किया है !
बचपन की एक कहावत मुझे अक्सर याद आ जाती है
"खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब", इस कहावत का मकसद शायद बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरणा देना ही रहा होगा , खैर तो हम खूब मन लगाकर पढ़े, लिखे लेकिन बात रही नवाब बनने की तो भई पता चला कि यहां दस्तूर ऐसा है कि नवाब का शाही तख़्त खुद ही बनाना पड़ेगा, हवेली भी खुद ही बनानी पड़ेगी और फिर नौकर, चाकर, तीमारदार सभी का ठेका भी अपने ही सर लेना पड़ेगा और तो और दिल को धक्का तब लगा जब पता चला कि नवाब बनने का मतलब था अच्छी सी नौकरी ! भई बस यहीं गड़बड़ हो गयी ख्वाब था नवाब बनने का और पढ़ाई थी नौकर बनने की ! श्रम से भी गए, शरीर से भी और हाथ आई मात्र ज़हीनी ग़ुलामी ।
हम सब उनके जीवन की एक मात्र पूँजी है, उन्होंने अपने शरीर और आत्मा दोनों को हम लोगों में इन्वेस्ट किया है !
बचपन की एक कहावत मुझे अक्सर याद आ जाती है
"खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब", इस कहावत का मकसद शायद बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरणा देना ही रहा होगा , खैर तो हम खूब मन लगाकर पढ़े, लिखे लेकिन बात रही नवाब बनने की तो भई पता चला कि यहां दस्तूर ऐसा है कि नवाब का शाही तख़्त खुद ही बनाना पड़ेगा, हवेली भी खुद ही बनानी पड़ेगी और फिर नौकर, चाकर, तीमारदार सभी का ठेका भी अपने ही सर लेना पड़ेगा और तो और दिल को धक्का तब लगा जब पता चला कि नवाब बनने का मतलब था अच्छी सी नौकरी ! भई बस यहीं गड़बड़ हो गयी ख्वाब था नवाब बनने का और पढ़ाई थी नौकर बनने की ! श्रम से भी गए, शरीर से भी और हाथ आई मात्र ज़हीनी ग़ुलामी ।
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